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यीशु का मार्ग

 

धर्म1) मनुष्य के ईश्वर से ‘‘पुनःसम्बन्ध" के रूप में - ईसा मसीह के पथ पर

1) RELIGION शब्द का मूल लैटिन भाषा का RE-LIGIO शब्द है अर्थात् पुनःएकता - परमात्मा के साथ, जो हमारे भीतर हमारे अन्तर्भाग से आकार प्राप्त करता है। इसी प्रकार का कुछ बड़े पैमानों पर भी घटित होता है, एक पूर्णतः स्वलेख (Hologram) के समान।

मानव जीवन की गहन समस्याओं की पहचान

शरीर को रोगमुक्त करने से परे भी अन्य परिवर्तनों के लिए ईसा मसीह का प्रथम प्रश्न होगा: ‘‘क्या तुम अच्छे होना चाहते हो? (जॉन 5, 6); अथवा यदि तुम परमात्मा के निकट आना चाहते हो, तो क्या तुम उस त्रुटि को जानते हो जिसे तुम्हें अब भी बदलना है? मनुष्य जीवन के सामान्य विषयों के पीछे छिपे महत्वपूर्ण सूत्रों को खोज सकता है जो साधारणतया धर्म से सम्बद्ध नहीं होते। वयस्कता की ओर अग्रसर एक बच्चा नवीन क्षमताओं को प्राप्त करता है ; यद्यपि, कुछ घटनाओं को तीव्रता से अनुभव करने की उसकी मौलिक क्षमताएँ ढक जाती हैं। बाद में मनुष्य इन प्राकृतिक क्षमताओं के नवीकरण का प्रयत्न कर सकता है। इस प्रकरण में मनुष्य से जुड़ी क्षमताएँ बनी रहती हैं, जबकि स्वयं का कठोर बनना ढीला पड़ जाता है अथवा मिट जाता है। मस्तिष्क एवं जीवन में रुकावट, जिसके परिणाम से बौद्धिकता एवं मूल प्रवृत्तिक जीवन में रुकावट आती है - ‘‘हृदय‘‘ के मध्य एक क्षीण सेतु के साथ - पुनः बेहतर रूप से एकीकृत हो जाते हैं। यह दिखाना संभव है, कि यह रुकावट स्वर्ग की कल्पना में ‘‘ज्ञान के वृक्ष का फल खाना" का एक अर्थ है ; और ईसा मसीह की उक्ति ‘‘जब तक तुम बदलते नहीं और बच्चों के समान नहीं बनते, तुम स्वर्ग के साम्राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे" परिवर्तन और वापसी की संभावनाओं के गहन अध्ययन (ज्ञान) पर आधारित है - मैथ्यू 18, 1-3; मार्क 10, 15; ल्यूक 18, 17। यह न केवल बच्चों के आकुलतारहित आचरणों का मामला है, बल्कि विकास के मौलिक आधारों से सम्बन्धित है, जो कि आद्यप्ररूपीय अभिरचनाएँ हैं - ‘‘मनुष्य के उपयोग के लिए शिक्षण‘‘ का खोया हुआ एक भाग। यह पथ आज की सीमित बौद्धिक संचेतना से बहुत दूर ले जा सकता है।

2) तो, अपने नकारात्मक (’शैतानी’) गुणों पर काबू पाने में उल्लेख किए गए अवरोध (बुद्धि, ’हृदय’, और सहजबोध के बीच) का उपचार शामिल है।
"Archetypal" सी. जी. जुंग और अन्यों के गहरे मनोविज्ञान का एक शब्द है, मानव के अस्तित्व की विभिन्न आकृतियाँ जो विभिन्न रूपों में महसूस की जाती है, जैसे सपनों में।

इसका यह अर्थ नहीं है, कि कोई अपने उत्साह से इन सभी का आसानी से प्रबन्ध कर सकता है। ईसा मसीह एक वास्तविक मार्ग प्रस्तुत करते हैं, एवं इसमें कुशलता प्राप्त करने के लिए शक्ति अथवा दया। सत्य की तलाश करने वाले ईसाईयों, रहस्यवादी ईसाईयों और कीमियागर ईसाईयों ने (अधिक) सर्वोत्तमता की अपनी राह ढूँढ ली (उदाहरण के लिए तुलना कीजिए मैथ्यू 5, 48; जॉन 10, 34; ............)। बहुत से अन्य ईसाईयों ने चेतन अथवा अवचेतन रूप से एक समान अनुभव किए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि उन्होंने भीतर की ओर तलाशा, अथवा उन्होंने अपना विश्वास सामाजिक जीवन में जताया, - अथवा उन्होंने दोनों को मिला दिया (जोड़ दिया) - जिसे हम ‘‘पूर्ण ईसाई धर्म‘‘ की संज्ञा देते हैं। सहस्रों वर्षों से बहुत सी अन्य संस्कृतियों ने भी अंतः टकराव के हलों को ढूँढा, उदाहरण के लिए ताओवादी कीमियागर, तथा कुछ योग विद्यालय3)।

3) भारतीय शब्द योग, शाब्दिक अर्थ 'बंधन में रखना' का अर्थ मूल और अनंतता से पुनः सम्पर्क चाहना भी है। इसका अर्थ यह नहीं है, कि इस तरह के दूसरे मार्ग उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर होंगे जैसे ईसाई मार्ग।

"देव-पुरूष" ईसा मसीह, "नव-आदम" संकेत है, कि उस समय से जब मनुष्य छिपे हुए मौलिक गुणों को पुनः प्राप्त कर लेंगे ; और कि यही समय है उनके पथभृष्ठ गुणों को सही करने का (बदलने का), जो इस अन्तराल में खतरनाक हो चुके हैं। पृथ्वी के लिए "भाग्यशाली अवसर" के समान, ईसा मसीह ने दोनों का प्रतिनिधित्व किया, जीवन के अर्थ के मौलिक स्रोत से सम्बन्ध - परमात्मा - और अत्यन्त विकसित मानवीय संचेतना। उन्होंने पतनशील शक्तियों को वश में किया। लोगों से भिन्न होने के बावजूद, वे भी मनुष्य थे जिन्होंने यह अभिव्यक्त किया। अतः लोग भी ऐसा कर सकते हैं, विशेषतया यदि वे इसे सचेत होकर करें। परन्तु, उनके लिए जो ऐतिहासिक ईसा मसीह के विषय में नहीं जानते, पुनर्जीवन समेत उनका जीवन (उन लोगों पर) प्रभाव डाल सकता है - इसी प्रकार जैसे वे

पशु जो अपने परस्पर क्षेत्र की शक्तियों से प्रभावित होकर, अपने द्वीप पर शीघ्रता से वह सब कुछ सीखते हैं, जो दूसरे द्वीप पर उनके जैसे दूसरे पशु सीख चुके होते हैं, आर. शेल्डरेक (R. Sheldrake) की खोज।

प्रारम्भ में ईसा मसीह से और ईश्वर से आंतरिक सम्बन्ध बिना गिरिजाघर के सम्भव है; यद्यपि, ईसाई-धर्म का एक उपयुक्त समुदाय सहायक है। विरोधाभासी ईश्वर-मीमांसाएँ, ईसा मसीह का धार्मिक सलाहकार होना अथवा केवल एक समाज सुधारक होना, अब अंतिम उपाय नहीं रह गए ; परन्तु वे किसी को एक संकेत दे सकते हैं, विशेषतया जब कोई किसी से अधिक जानता हो। प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रकोष्ठ के एकान्त में स्वयं को ईसा मसीह के अनुकूल बना सकता है, किन्तु अंत में खुले में (बाज़ार में) भी। इस उद्देश्य के लिए मनुष्य ईसा चरित द्वारा प्रदान किए गए अपने गुणों को याद रख सकता है। जो मनुष्य ईसा मसीह को मृत्यु के पश्चात् पुनर्जीवित के रूप में जानने में रुचि रखता है, वर्तमान समय में क्रियाशील होने के समान ईसा मसीह से सम्बन्ध रख सकता है। (लोगों के मृत्यु के पश्चात् भी उत्तरजीवी होने के कई प्रमाण हैं ; प्रायः ईसा मसीह से भिन्न स्थिति में होने के)। कोई भी ‘‘उनके नाम की‘‘ प्रार्थना करते हुए उनके साथ अपने ज्येष्ठ भ्राता के समान परमात्मा को अनुभव कर सकता है, जो सबको ढक लेता है। ( देखें: जॉन 15, 16; मैथ्यू 6,7 - 15 ;मैथ्यू 18, 19-20)। उदाहरण के लिए:

परमात्मा, मेरा उद्गम, मेरी सहायता (करने वाला) और मेरी आशा !

ईसा मसीह के साथ मिल कर’ आपसे प्राप्त होने वाली प्रत्येक वस्तु के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ;

और आपसे प्रार्थना करता हूँ मुझे वह सब कुछ, जो मुझे आपसे बहुत दूर ले गया है,

क्षमा कर दीजिए**;

इस मौन में कृप्या मुझे आप अपने तेज द्वारा रचनात्मक बनने दें ***;

मुझे अपने पास बुलाएँ

* जो मैरी को सम्मिलित करना चाहते हैं, यह कर सकते हैं। इस प्रकार मनुश्य की नर एवं नारी विशेषताएँ भी प्रभावित होती हैं।

** एक अतिरिक्त प्रथा हो सकती है: प्रथम -नकारात्मक महसूस किए जाने वाले एक संवेग को देखना, अथवा इसके समान कुछ, जैसे वह घटित हो रहा हो (उदाहरण के लिए व्यग्रता, द्वेष एवं क्रोध, उदासीनता तथा परिकल्पना, नितान्त संदेह-अथवा एक समस्या, चाहे वह मस्तिष्क अथवा केवल शब्दों में घटित हुई हो, मैथ्यू 5.22 से तुलना कीजिए।) द्वितीय- उस पर चिंतन करने के बजाए, एक क्षण प्रतीक्षा करना, जो वह है उसके प्रति जागरूक होना। तृतीय - यह समस्या- जो अब महसूस की जा सकती है - परमात्मा को प्रार्थना में प्रस्तुत करना। (इसके आगे, इसी प्रकार यह संभव है, अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा अथवा ईसा मसीह के हाथों सौंप देना।) चतुर्थ - कुछ राहत महसूस होने तक शान्तिपूर्वक प्रतीक्षा करना।

*** तब पुनः नए कार्यों के लिए अधिक उन्मुक्तता होती है।


इस पथ पर नैतिकता का महत्व

पथ पर एक स्तर है ‘‘परमात्मा से प्रेम’’, जो कि सर्वोपरि है, ‘‘और अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करो’’ (मैथ्यू 19,19) दूसरे के लिए किये जा सकने वाले काम को ढूंढने के प्रयास का हिस्सा, स्वयं से प्रेम करना भी हो सकता है। प्रेम स्वयं को ईसा मसीह के साथ जोड़ सकता है क्योंकि बुद्धिमता के साथ मिलकर यही उसका वास्तविक स्वभाव है। साथ ही अच्छे कार्यों का मार्ग अपने प्रभावों के साथ ईसाई पथ को स्पष्ट करता है। ईसा मसीह ने पुराने नैतिक मूलों को बनाए रखा; क्योंकि (प्रायः) ‘‘मनुष्य जो बोता है वही काटता है’’ (Gal. 6,7) पर उन्होंने बाह्य नियमों से अधिक एक व्यक्ति के उत्तरदायित्व को महत्व दिया। यहाँ यह अनुभव किया जा सकता है, कि हमारे भीतर कुछ है - उदाहरण के लिए - सचेत महसूस करना - जो की आत्मा के समरूप है, जिसका उदाहरण ईसा मसीह ने अपने जीवन द्वारा दिया है। इस बात को वैयक्तिक रूप से हृदय में या आत्मा में या जीवात्मा में अनुभव किया जा सकता है। ईसा मसीह के परिचित गुणों को अपने भीतर जितनी बार हो सके धारण कर लेना लाभदायक है; अतः प्रभु से एक अधिक सीधा सम्पर्क स्थापित हो सकता है - चाहे इस समय कोई बड़ा परिणाम सामने न आये।

हमारे भीतर इस प्रकार दयालुता से विकसित होने वाली शक्ति, संसार को व्याधिमुक्त करने वाली शक्ति को आकर्षित कर सकती है जो कि पुनः ‘‘बाह्य’’ ईसा मसीह और परमात्मा द्वारा प्राप्त होती है। परन्तु, इस प्रकरण में, स्वयं तथा प्रसंग पर पड़ने वाले प्रभाव गहन हो सकते हैं।

पहले के कुछ ‘‘अप्रकट’’ और ‘‘संतों’’ द्वारा किये गये वे अनुभव, अब साधारण व्यक्ति द्वारा हमारे ‘‘भविष्य सूचक’’ समय में प्रचारित किये जा सकते हैं - इसका महत्व तुरन्त नहीं पहचाना जा सकेगा, और इसलिए इसकी यहां चर्चा होनी चाहिए। संबंधित लोग इस परिवर्तित हो रही शक्ति को स्वीकार कर सकते हैं; अन्यथा यह दुःखद रूप से उन लोगों के व्यवधानों को क्षति पहुंचा सकता है, जिन्होंने इसके अनुरूप पर्याप्त गुणों को धारण नहीं किया है- ताकि इसे किसी ‘‘निर्णय’’ के समान महसूस किया जा सके।

मेरा मार्गदर्शन कीजिए, कि मैं दूसरों को उनके, आप तक पहुँचाने वाले पथ में हानि नहीं पहुँचाऊँगा। **

आप की इच्छानुसार दूसरों की सहायता करने के लिए मेरा मार्गदर्शन कीजिए।

मेरे पथ पर मेरी रक्षा कीजिए। *

अपने स्नेह के साथ चलने में मेरी सहायता कीजिए।

*) यहां दूसरों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।

**) किसी के चरित्र की समस्याओं और सकारात्मक गुणों को उजागर होने पर नोट करना सहायक होता है, और इस तरह अगर कोई सुधार है, तो सचेत हो नियंत्रण करना। इस पर कार्य करने की कुछ सम्भावनाएँ हैं:

1. जीवन की समस्याग्रस्त घटनाओं पर सीधे कार्य करना। सकारात्मक इरादे। यीशु ने भी लोगों को अपनी स्वयं की समस्याओ को पहले देखने के लिए सलाह दी (मैथ्यू 7, 1-5). इस्लाम में भी ये "महान जिहाद" है, यानि "महान धर्मयुद्ध", किसी बाहरी संघर्ष से अधिक महत्वपूर्ण और अधिक कठिन। बहुत से संघर्षो का इस प्रकार एक सकारात्मक समाधान हो सकता है।

2. अपनी गलतियों को सही करना, साथ ही-

3. जहाँ तक हो सके, एक दूसरे को सीधे क्षमा कर देना। या फिर प्रार्थना की जाए और इस प्रकार समस्या को समाधान के लिए ईश्वर को दे दिया जाएः और अपनी आत्मा में क्षमा कर दिया जाए। यीशु भी इस बारे में कहते हैं "अंतिम पैसे तक चुकाना" (ल्यूक 12,59: पर नीचे 5 भी देखें)

4. अगर और कोई सम्भावना न हो, तो दूसरे के लिए अच्छे काम किए जा सकते हैं, जिन्होने ने नुकसान किया है वे नहीं। बहुत से काम ईश्वर के द्वारा क्षमा कर दिए जाते हैं, अगर कोई, उदाहरण के लिए, जनता की भलाई के लिए कोई कार्य करता है। (जो हो चुका उसे साफ करने, और स्वैच्छिक सहायतापूर्ण कार्य करने में जब वह पारस्परिक हो जाता है, के बीच की सीमा काफी धूमिल है, "जो बोता है वही काटता है" उदा. जान 4,37)। यहाँ साफ है, मैथ्यू 7,20-21 के अनुसारः "इस तरह, उनके फलों से आप उन्हे पहचान लोगे। हर कोई जो मुझे "ईश्वर" "ईश्वर" कहता है स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, पर जो मेरे पिता की इच्छा पूरी करता है, वह स्वर्ग में होगा।"

5. "मेरे नाम पर ईश्वर से प्रार्थना करो", किसी के जीवन में आगे विकास के लिए उसकी क्षमा और दया प्राप्त करो। यह महत्वपूर्ण सहायता है, जो शुद्ध मानव नैतिकता नहीं दे सकती। भाग्य को अब किसी मशीनी चीज की तरह नहीं माना जाता. बल्कि वह र्है ईश्वर के द्वारा निर्देशित, सब कुछ तय हो चुका है, जैसा सर्वोत्तम है किसी के लिए और सब के लिए, जैसा परमात्मा ने देखा है।


इतिहासपूर्व संस्कृतियों में बड़े पैमाने पर समरूप परिवर्धन

बचपन से वयस्कता तक विकास के चर्चित पड़ावों के समान, मानवीय संस्कृतियाँ संचेतना के समरूप चरणों से निकलीं। एक ओर तो वे नयी क्षमताओं में परिणित हुईं (इच्छाशक्ति, संवेदनाएं और पहले से अधिक स्वतंत्र चिन्तन)। दूसरी ओर समस्त ‘‘सर्जन’’ की मौलिक सुपरिचितता का संदिग्ध प्रभावों के साथ ह्रास हुआ। (उदाहरण के लिए जीन गेब्सर (JEAN GEBSER **URSPRUNG   - UND GEGENWART" - जर्मन) की तुलना कीजिएः एक के बाद एक ‘‘पुरातन’’, एक ‘‘जादू’’, एक ‘‘पौराणिक’’ और बौद्धिक संचेतना; उसके आगे एक अधिक एकीकृत सहज बुद्धि का विकास किया जा सकता है। श्रेष्ठ प्राणियों ने अपनी संस्कृतियों के लिए ऐसे उत्पन्न उपायों को सफल बनाने में सहयोग किया। यह सभी बाधाओं के बावजूद हुआ, किन्तु जैसा कि विदित है- पूर्व क्षमताओें को क्षति पहुंचाते हुए। नवीन इतिहास में मानव जाति एवं राष्ट्रों को, इसके आगे के छोटे अथवा बड़े विकासवादी कदमों में पारंगत होने के लिए, यदि वे बने रहना चाहते हैं, चुनौती स्वीकार करनी होगी।

ये संभावनाएँ लगभग 2000 वर्षों से हैं। यह घटनाचक्र बुद्धि जैसी पूर्व विशेषताओं का और ह्रास न करे। यदि पर्याप्त लोग एक अधिक से अधिक पवित्र सहज बुद्धि विकसित करें, और अपने दैविक मूल के साथ अपने संबंधों का नवीकरण करें, मानव जाति ‘‘उपरोक्त’’ की सहायता से भावी महासंकटों के विरूद्ध दौड़ में विजय प्राप्त कर सकती है। संसार में शांति आंदोलन जैसे कार्यकर्ताओं में भी एक संबंध है-शुभेच्छा वाले सभी लोगों की अनिवार्य रूप से ‘‘खेल’’ में अपनी भूमिका होती है। कई लोग - सुस्थापित धार्मिक विद्यालयों में - स्पष्टतः तलाश कर रहे हैं। वे भविष्य में आगे चले जाते हैं और इतिहास से दूर होने में सहायता करते हैं - यद्यपि कुछ ‘‘साधारण गुण’’ हो सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि कोई सोचता है कि उद्देश्य मानवता ‘‘की रक्षा करना’’ अथवा संचेतना में प्रगति करना है। मूल्यों के समकालीन मापक्रम परिवर्तित होने चाहिए, क्योंकि यह स्पष्ट है कि पुरानी ‘‘योजना’’ कहां ले जायेगी। सब कुछ समस्त का भाग है, ओर इसलिए सभी नेक कार्य संसार की सहायता करते हैं।

4) हम निराशावादी विचार भाव से सहमत नहीं हैं, हर्बर्ट ग्रुहल की अन्तिम पुस्तक "HIMMELFAHRT INS NICHTS" (जर्मन अनुवाद ‘‘प्राव-काल्पनिक की ओर आरोहण’’), केवल इसलिए क्योंकि विकास एवं शक्ति के एक भुलाए जा चुके स्रोत को महसूस किया जा सकता है, जो, तथापि केवल एक संयोग हैः परमात्मा।

लोगों को आपके हाथ में जीवन एवं मरण के निर्णयों को देने के लिए प्रेरित करें। *

जो आपके सृजन के कार्य करें, उनकी सहायता करें।

अपने प्रतिश्रुत नवीन काल के पथ पर इस संसार को ले जाएं। **

* यहाँ विस्तृत जानकारी दी जा सकती है अथवा प्रार्थना के उपरांत चिन्तनपूर्वक मनन किया जा सकता है, इस प्रकार: ‘हिंसा में वृद्धि को रोकने के लिये’, ‘हिंसा के एक कारण को समाप्त कर देने की समस्याओं का निवारण करने के लिये’, ‘धर्मों के सज्जनों के बीच एक शान्तिवार्ता आरम्भ करने के लिये’, .......

** ल्यूक 11:2; 21:31. दैविक प्रकाशन 111:16; प्रभु स्वयं को दिए गए प्रेम को पसन्द करते हैं।

अतः लघु मापक्रम एवं दीर्घ मापक्रम पर परमात्मा की ओर एक ‘‘विचार परिर्वतन’’ अपने वश में है

JOHN 16, 12.13: ‘‘मैं अब भी तुम से बहुत कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन तुम अभी सहन नहीं कर सकोगे। 13: जब सत्य का अभिप्राय आएगा, वह सम्पूर्ण सत्य में तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; वह अपने प्रभाव पर नहीं बोलेगा, किन्तु वह जो भी सुनेगा उसे बोलेगा, तथा वह तुम्हारे लिए आने वाले कार्यों की घोषणा करेगा।

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मुख्य-पृष्ठ को Ways-of-Christ.com/hi

अग्रिम विषयों के साथ मुख्य अंग्रेज़ी पाठ

ईसा मसीह के तरीके, मानवीय संचेतना एवं मानव जाति तथा पृथ्वी के परिवर्तनों में उनका योगदान: एक स्वतंत्र सूचना-पृष्ठ, अन्वेषण एवं अनुभव के अनेक क्षेत्रों के लिए नए दृष्टिकोणों के लिए व्यावहारिक संकेतों के साथ

 (english) Informations in websites of others about Christianity in India,
and about its origin, the disciple
Thomas